महन्त श्री गणेशदास

Mahent Shri Ganesh Das
महन्त श्री गणेशदास जयपुर के आस-पास के क्षेत्रों में आज भी सम्मानजनक स्थान रखते हैं। राजस्थान की पृष्ठभूमि भी कुछ ऐसी है जहां धार्मिक क्रियाकलापों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। केसरी नंदन हनुमान के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है। ऐसे ही संस्कार महन्त श्री गणेशदास को अपने पिता मंगलदास से मिले जो वचन के पक्के थे जिन्होंने अपने वचन का पालन करने के लिए जमीन-जायदाद, गांव सब त्याग दिया।
महन्त श्री गणेशदास उनकी चार संतानों में दूसरे थे। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, ईश्वर के प्रति आस्थावान थे। शस्त्र और शास्त्रों का अध्ययन/प्रशिक्षण लेना भी कम आयु से ही प्रारम्भ कर दिया था। भगवद्भक्ति में भी उनका अधिक समय व्यतीत होता था। उनकी योग्यता ने लोगों के बीच उन्हें लोकप्रिय बना दिया। अपने गुरु की कृपा से उन्होंने प्रत्येक विपित्त का सामना धैर्य से किया – आरम्भिक दिक्कतों के पश्चात् बालक गणेश को वैष्णव सम्प्रदाय के महन्त तथा श्री सियावरजी मन्दिर, मैड़ (जयपुर) के पुजारी स्वामी रामदास महाराज का शिष्य बनाया गया। बालक गणेश दास गुरु-सेवा तथा भगवद् सेवा में पूर्ण समर्पित हो गये। ग्यारह वर्ष की अवस्था में शिष्यत्व ग्रहण करने के पश्चात् गणेश दास ने कठोर तपस्या करके तन्त्र-मन्त्र की सिद्धियों को भी परोपकारार्थ प्राप्त किया। गुरू रामदास महाराज के ब्रह्मïलीन हो जाने के पश्चात् श्री गणेश दास श्री सियावरजी के मन्दिर के महन्त बने। पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मïचर्याश्रम में रहते हुए कठोर तपस्या एवं समर्पित ईश-सेवा करके श्री गणेश दास ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। सद्गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए महन्त जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन मन्दिर की सेवा-पूजा में समर्पित कर दिया। स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाकर भगवान को भोग लगाते थे। ईश्वर की कृपा से महन्त गणेश दास महाराज ने असंख्य दुखी प्राणियों के कष्टों को दूर किया तथा जनता जनार्दन के हृदय में प्रतिष्ठिïत हुए। शनिवार एवं मंगलवार के दिन मन्दिर में सत्संग होता था। महन्त जी भूत-प्रेत से पीडि़त व्यक्तियों को भी राहत प्रदान करते थे। इस समस्या से पीडि़त व्यक्ति का इलाज आधुनिक आयुर्विज्ञान के पास भी नहीं है। तन्त्र-मन्त्र से पीडि़त व्यक्ति और भूत-प्रेत की आधि-व्याधि से पीडि़त व्यक्ति जब कष्टïों से राहत पाते थे तो वे हृदय के अन्त: स्थल से महन्त श्री गणेश दास महाराज के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते थे। वास्तव में महन्त श्री गणेश दास महाराज सच्चे कर्मयोगी थे।

उनकी इस भक्ति एवं उनमें आस्था की चर्चाएं पास ही के ग्राम मैड़ के राजपूतों के कानों तक भी आ पहुंची। ग्राम मैड़ के पास ही बाणगंगा नदी (पाण्डवों के अज्ञातवास की समाप्ति पर अर्जुन के बाण से उद्गमित) पर श्री ‘सियावर जी का मंदिर’ नामक स्थान है। मंदिर के हक में लगभग 120 बीघा पक्की जमीन थी और इसके महन्त वैष्णव सम्प्रदाय के श्री रामदास जी महाराज को गांजा, भांग आदि का इतना अधिक चस्का लग गया था कि उन्होंने मंदिर के किवाड़ तक गिरवी रख दिये थे।
मंदिर के पास करोड़ों रू. के आर्थिक साधन थे जिसके कारण राजपूतों का एक गुट उस पर कब्जा करना चाहता था परन्तु एक अन्य गुट ने महन्त श्री गणेशदास की योग्यता को पहचानकर उन्हें रामदास का शिष्यत्व ग्रहण करवाया। मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में वे इनके शिष्य बने। गुरु जी विरोधियों की बातों में आकर महन्त जी को प्रताडि़त करते परन्तु वे अपने कर्मपथ पर बिना विचलित हुए बढ़ते रहे। अपने गुरु को भी उन्होंने अपने सेवाभाव से प्रभावित कर लिया। आश्रम में आने वाले प्रत्येक साधू को अपने सेवा-भाव और लगन से प्रभावित कर उनसे तन्त्र-मंत्र आदि सिद्धियां सीख लीं, स्वयं भी तपस्या से सिद्धियां प्राप्त की। जैसे-जैसे उनकी प्रसिद्धि बढ़ी। दूसरा पक्ष उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगा। मुकद्दमा भी करवा दिया। एक समय ऐसा आया जब उन्हें आश्रम से भी जाना पड़ा।
”युवक गणेशदास इन घटनाओं से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने सेवा पूजा का अवसर न मिलने के संबंध में भगवान से क्षमा मांग ली और जंगल में ही एक पत्थर को भगवान मानकर उसकी पूजा करने लगे। वे अपना पूजा-पाठ पूर्ण विधि विधान के साथ किया करते हैं।
अंत में विजय सत्य की हुई और मुकद्दमा जीतकर आश्रम का सम्पूर्ण प्रबंध इनके हाथ में आ गया। स्वामी रामदास की मृत्यु के पश्चात् इन्हें मंदिर का महन्त नियुक्त किया गया। गृहस्थ आश्रम मेंं इन्होंने प्रवेश 25 वर्ष में किया। दोनों दायित्वों का निर्वहन सफलतापूर्वक किया।
‘महंत श्री गणेश दास जी महाराज स्वाभिमानी एंव अक्खड़ प्रकृति के व्यक्ति थे। घुटनों तक ही धोती, पूरी आस्तीन की रेजी की बनी हुई बंडी, पैरों में बाड़ीजोड़ी की जूतियाँ और ठाकुरजी की सेवा-पूजा में लकड़ी की खडाऊ, यही था उनका पहनावा। ……… गले में तुलसी की माला, तुलसी का मणिया और सिर पर चंदन की बिन्दी वे हर समय लगाए रहते। कहीं बाहर जाते तो खादी की कमीज और कंधे पर अंगोछा।
महन्त श्री गणेशदास समय के पाबन्द नियम के पक्के रहे। स्वयं तीनों पहर भगवान की पूजा करते, स्वयं अपने हाथों से रोटी बनाकर भगवान को भोग लगाते, फिर खाना खाते। आश्रम में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वयं खाना बनाते। देर रात तक भगवान की तपस्या में लीन रहते। ऊपरी बीमारियों का इलाज करते। यही कारण है कि उनके प्रति लोगों में श्रद्धा बढ़ती गई। कई ऐसे प्रसंग है जिनके कारण पाठक भी उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं। संसार में जहां विज्ञान की सीमा समाप्त होती है वही से उस परम सत्ता का विस्तार आरंभ होता है।
”कर्मयोगी महन्त श्री गणेशदास जी प्राणीमात्र के प्रति मानवोचित्त व्यवहार करते थे। उनके आश्रम में ऊपर की बीमारियों से पीडि़त स्त्री-पुरुष, बच्चे आदि अक्सर आया करते थे। भक्तों के खान-पान एवं ठहरने आदि की व्यवस्था उनके द्वारा ही की जाती थी। अपने भक्तों के लिए वे स्वयं अपने हाथ से खाना बनाकर उन्हें खिलाया करते थे। इस कार्य में अपनी पत्नी या मेहमानों की कभी भी सहायता नहीं लिया करते थे। अतिथियों को अपने हाथ से बनाया हुआ खाना खिलाकर उन्हें अपार आनन्द की अनुभूति होती थी।

महंत जी प्रात: काल पांच बजे उठ जाया करते और नित्यप्रति गंगा नदी में स्नान करते आते। उसके पश्चात् भगवान की पूजा-आरती करते एवं उनके भोग लगाते। दोपहर को अपने हाथों से दो मोटे-मोटे टिक्कड बनाते और पूजा करके भगवान के भोग लगाया करते, तत्पश्चात् स्वयं प्रसाद पाते थे। ……… रात्रि को संझारती करके मिश्री या बताशे का भोग लगाते और उसके बाद देर रात तक तपस्या में लीन रहते।

सेवा को ही उन्होंने अपना धर्म माना। एक कर्मयोगी बनकर उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण जिया। उन्होंने अपनी तपस्या से उनकी शरण में आने वाले प्रत्येक भक्त की रक्षा की। इसका प्रमाण उनके द्वारा अपने भक्त को दिया गया एक ताबीज है, जिसमें उन्होंने अपने एक भक्त और उसके पुत्र के आगे संतान उत्पत्ति की तारीख एक ताबीज में लिखकर रख दी थी। पढऩे में शायद ऐसी घटनाएं अविश्वसनीय लगती हों परन्तु जो महन्त जी के सान्निध्य में रहा हो उसके लिए ऐसे चमत्कार होना सामान्य बात थी। इतने तपस्वी और सिद्ध पुरुष होने के पश्चात् भी महन्त जी ने सदा सादा जीवन ही व्यतीत किया जो उनकी महानता का प्रतीक है।
अपने भक्तों को वे सदाचार, नीति का उपदेश देते। समय का सदुपयोग करने को कहते। संतोष को सबसे बड़ा धन बताते। यही एक सिद्ध पुरुष होने का प्रमाण है।
महंत श्री गणेश दास जी की भजन मण्डली एवं उसके सदस्य

1. महंत श्री गणेश दास जी – गायक एवं मंजीरा वादक

2. श्री रूड सिंह शेखावत (बाबोसा ) – गायक एवं नर्तक

3. श्री विश्वनाथ महंत (सुआ लाल शर्मा ) – गायक
4 . श्री भूर जी वैद्य – गायक

5 . श्री सोहन नायक – हारमोनियम वादक
6 . श्री घींसा लाल गूर्जर (छीण्ड ) – श्रोता
7 . श्री प्रभाती लाल दहिया – श्रोता
8 . श्री महादेव, सगरा कीर, दाना मीणा, रामला बाबा,नारायण जाट, वल्लभ दास – श्रोतागण
9. कीरों के सूरदास – गायक
10 . बाबू लाल,
कैलाश

रामस्वरूप, कृष्ण – बाल श्रोता, दरी बिछाने एवं भजनियों को चाय पकड़ने वाले
11 . नारायणी, नारंगी, विमला, सुनीता – महिला श्रोता

12. घींसा कंडेरा, भूरा रैगर – श्रोता एवं महंत श्री के खेत में काम करने वाले

‘ हर शनिवार एवं मंगलवार के दिन महात्मा जी सत्संग करवाते। संझारती के बाद से ही तैयारियां प्रारम्भ हो जाया करती। ……… सत्संग के लिए भक्तों का आना प्रारम्भ हो गया। बरामदे के बीचों बींच हारमोनियम रखा हुआ है जिस पर सांगत करने सोनाराम नायक बैठ गए जो पेशे से दरजी का काम करते थे परन्तु हारमोनियम बहुत अच्छा बजाते थे। उनके पास ही सुआलाल महंत बैठते जो अपने स्वयं के भजन बना बनाकर गाने में सिद्धहस्त थे। यों तो कीर्तन मण्डली के सभी सदस्य भी गाने में दखल रखते थे परन्तु सुआलाल जी की बात ही कुछ और थी। वे महंत श्री गणेश दास जी की दिनचर्या, क्रियाकलापों आदि के बारे में भजन बना बनाकर गाते थे और मजाल कि कहीं जरा सी भी कोई कमी रह जाय। सब के सब शास्त्रीय संगीत की धुनों पर आधारित थे।
सुनते हैं कि सुआलाल कभी बहुत बड़े जागीरदार थे। विवाह भी किया था उन्होंने। जैसे गौरवर्ण एवं सुन्दर नाक नक्श वाले वे स्वयं थे उससे अधिक सुन्दर उनकी पत्नी थी, परन्तु किसी बात पर नाराज होकर ऐसा दुष्कृत्य कर बैठे कि उन्हें अपनी पत्नी को अपने जीवन के मार्ग से हटा देने के पाप का भागी बनना पड़ा। सुआलाल जिन्हें गाँव के अधिकतर लोग विश्वनाथ के नाम से जानते थे संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान थे। कौमुदी के सैंकड़ों सूत्र उन्हें कंठस्थ थे और वे उनकी ऐसी ऐसी व्याख्या करते कि गाँव की प्रवेशिका स्कूल के हैडमास्टर तक दांग रह जाय करते।
सुआलाल जी अपनी पत्नी की मृत्यु से पूर्व महंत थे परन्तु बाद में संत हो गए। छतरी के बाजार की धर्मशाला में उन्होंने अपना आवास बना रखा था। उनके पास जमीन काफी थी जिसे बेचकर नित पकवान खाया करते। उन्हें कुत्ते पालने का बड़ा शौक था अतः उन्होंने कुत्तों की एक अच्छी बटालियन पाल राखी थी जिसका प्रमुख ‘बंडा ‘ नाम का एक कुत्ता था। अब भगवद्भक्ति ही विश्वनाथ जी का एकमात्र उद्देश्य रह गया था और इसीलिए वे नित्य महंत श्री गणेश दास जी के सत्संग में आया करते।
बरामदे के बायीं ओर रूड सिंह जी ठाकुर साहेब आ बैठते। उनके पिता कभी इस गांव के प्रभावशाली व्यक्ति थे। ठाकुर साहेब पर लक्ष्मी एवं सरस्वती दोनों ही की कृपा थी जिसके कारण गांव में उनकी प्रतिष्ठा थी। नंगे पैर, ऊपरी नंगे बदन, केवल घुटनों तक की धोती और शीशे की तरह चमकता लाल अंगोछा, यही था ठाकुर साहेब का पहनावा। प्रातःकाल घर पर भजन करना , दोपहर में आराम और नित सायंकाल महात्मा जी के आश्रम में रहकर रत दस बजे घर वापस जाना , यही थी उनकी दिनचर्या। ईश भक्ति के पदों को गाते गाते जब वे भाव विभोर होकर ठाकुरजी के सामने नृत्य करते तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती और सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता।
बरामदे के दायीं ओर भूरजी वैद्य बैठ गए जो राजकीय श्रीराम प्रवेशिका स्कूल परिसर में स्थित राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय में वैद्य थे। वे अपने कर्म के प्रति ईमानदार और पेशे के प्रति इतने वफादार थे कि यदि रात के वक्त भी किसी गांव में किसी के बीमार होने की सूचना मिल जाती तो वे स्वयं अपनी घोड़ी पर सवार होकर उसके गांव पहुंच जाया करते। गांव वाले उन्हें भरपूर सम्मान देते और उनकी घोड़ी को हरा हरा चारा और भिगोया हुआ दाना। वैद्य जी की घोड़ी गांव में इस कदर प्रसिद्ध हो गयी थी कि गांव के बच्चे जाते हुए वैद्य जी को संगीतमय राग में छेड़ते -‘ वैद्य जी की घोड़ी , बिना लगाम दौड़ी ‘.
वैद्य जी से थोड़ा दूर हटकर सद्दी लाल धानका आकर बैठ गए। उन दिनों वे गांव में अछूत मने जाते थे ,अतः उन्होंने स्वयं ही अपनी सीमा निर्धारित कर ली थी। महात्मा जी ने उन्हें कई बार कहा भी था -सद्दा ! यह भगवन का दरबार है जहाँ कोई जात-पांत नहीं हुआ करती अतः तुम भी आगे आकर बैठा करो।
अन्य सत्संगी भी आग्रह करते , परन्तु सद्दी लाल धर्म के पक्के थे , अतः अपनी झुकी हुई कमर और आँखों पर लगे टूटे फ्रेम के चश्मे में से इस प्रकार की दीनता दिखाते कि फिर कोई कुछ न कहता क्योंकि उनका तर्क भी तो वजनी हुआ करता -महाराज , ठाकुरजी की कृपा से मुझे यहाँ बैठने का जो सौभाग्य मिला वह क्या मेरे लिए काम है। मैनें पिछले जन्म में जैसा कर्म किया वैसी ही जाती में मुझे जन्म मिला , अतः अब मैं धर्म विरूद्ध कार्य करके अपना अगला जन्म क्यों ख़राब करूं !’
सद्दी लाल का एक ही बीटा था ‘बद्री ‘ । अपने पिता की तरह ही नेक , ईमानदार और मृदुभाषी, जो चेजे का काम करता था। ऐसा मिस्त्री था कि उसके बनाये हुए मकानों को देखकर बड़े-बड़े इंजीनियर भी दातों टेल उंगली दबाया करते थे। थोड़ी बहुत खेती की जमीन भी थी उनके पास। सद्दी लाल खेत पर काम करता और बेटा चेजे का। परन्तु एक दिन जब बद्री किसी नए बन रहे मकान की पट्टियां चढ़ा रहा था तब दुर्घटनावश उनके नीचे दबकर मर गया और उसके मां-बाप बेसहारा हो गए। सद्दी लाल को अब भी कई बार ऐसा लगता कि उसका बेटा बद्री उसके लिए दोपहर की रोटियां लेकर आया है और ऊंची आवाज में उसे पुकार रहा है – ‘बाप.… अरे ओ बाप ‘ । और सद्दी लाल को पता ही न चलता कि वह कब महात्मा जी के आश्रम में पहुँच जाता। वह इस भजन मण्डली की आत्मा था ढोलक इतनी अच्छी बजता कि श्रोतागण सांस लेना तक भूल जाया करते। महात्मा जी स्वयं भगवान जी के सामने जमीन पर बैठ गए। सद्दा बाबा ने ढोलक की कड़ियां चढ़ायी , सोहन नायक ने बाजा संभाला, वैद्य जी ने खड़ताल और सुआलाल जी ने ताल संभाली। महंत गणेश दस जी गाने लगे – ‘हो। … भाव रो भूखो छै नन्दलाल। …. ‘ ठाकुर साहेब खड़े होकर नाचने लगे। महात्मा जी गए जा रहे थे , ठाकुर साहेब नाचे जा रहे थे। भूरा बेगारी बरामदे के बाहर बैठा हुआ ठाकुर जी के मंडप में लगे पंखे की डोर संगीत की ले के साथ खींचे जा रहा है परन्तु फिर भी ठाकुर जी की प्रतिमा को पसीना आ गया। महात्मा जी गाते गाते बीच बीच में उठकर अंगोछे से ठाकुर जी का पसीना पोंछकर उसे भक्तों पर छिड़कते जाते।

‘ (साभार : पुस्तक ‘कर्मयोगी-पृष्ठ संख्या 40 से 44 , लेखक- डॉ कैलाश चन्द्र शर्मा, प्रकाशक – भारती पुस्तक मंदिर , जनरल अस्पताल मार्ग , भरतपुर ,’)