Dr. Kailash Chandra Sharma

डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा
डॉ कैलाश चन्द्र शर्मा की जन्मस्थली -श्री सियावरजी का मंदिर

अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के गुरु श्री रामकिशोर मिश्रा, उनकी पत्नी एवं साहित्यकार श्री जगदीश छत्रवाल के साथ विराटनगर में   डॉ कैलाश चन्द्र शर्मा 
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डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा के प्रकाशित ग्रन्थ एवं उनके साहित्य पर पीएच.डी., एम फिल शोध कार्य
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पीएच.डी., एम फिल शोध पंजीकरण पत्र

Ph.d Topic Nagpur     Phd Hardwari     Phd Kuldeep    Mphil letter Thesis      Dr. Kailash Dhundhari Geet                     sudhir Mathur Thises final

Thesis

जीवन परिचय—

जन्म—साहित्य के उत्कृष्ट साधक व कर्मयोगी साहित्यकार कैलाशचन्द्र शर्मा जी का जन्म 19 जुलाई सन् 1957 को राजस्थान प्रान्त के मैड़ ग्राम में हुआ। डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा जी को अपने जन्म के समय के सम्बन्ध में मतभेद है। आपको अपनी माता जी से केवल इतना ही पता चल पाया है कि जिस दिन आपका जन्म हुआ उस दिन बाणगंगा का मेला था और तिथि के हिसाब से यह मेला प्रतिवर्ष उतरते वैशाख की पूर्णिमा के दिन लगता है। जब आपने विद्यालय में प्रवेश लिया तो गुरुजी ने अपने हिसाब से कल्पना कर आपकी जन्म तिथि 19 जुलाई सन् 1957 लिख दी और तब से समस्त सरकारी प्रमाण पत्रों में यही तिथि आपकी जन्मतिथि मानी जाने लगी।

माता-पिता—कैलाशचन्द्र शर्मा जी के पिता श्री गणेश दास जी ग्राम मैड़ में स्थित श्री सियावरजी के मन्दिर में महन्त थे। वे जीवन-यापन के लिए कृषि कार्य भी किया करते थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवत्-भक्ति एवं जनसेवा में व्यतीत किया। उन्हें अपने जीवनकाल में अपने पुत्रों की ओर से कोई सुख न मिला। ऐसे समाजसेवी एवं परोपकारी व्यक्ति का 29 मार्च 1980 को निधन हो गया। कैलाशचन्द्र शर्मा जी की माता श्रीमती नारायणी देवी गृहकार्य में दक्ष एक विदुषी महिला थी। आप मातृ स्नेह से वंचित ही रहे क्योंकि आपकी माँ अधिकतर अपने पीहर टोडा (जयपुर) में ही रहा करती थी।

शिक्षा—कैलाशचन्द्र शर्मा जी की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम मैड़ में स्थित राजकीय श्रीराम प्रवेशिका संस्कृत विद्यालय में हुई। आप प्रारम्भ से ही मेधावी छात्र रहे और अपनी कक्षा में अव्वल आते रहे। आठवीं की परीक्षा पास करने के उपरान्त आपने शाहपुरा (जयपुर) के राजकीय श्री कल्याण सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय में जीव-विज्ञान विषय लेकर प्रथम श्रेणी से नौवीं कक्षा पास की। इसके उपरान्त आपने जयपुर के पोद्दार उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया परन्तु दसवीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर नौकरी हेतु कलकत्ता चले गया। वहां पर आपका मन न लगा और नौकरी छोड़़कर वापस जयपुर आ गए। तदुपरान्त स्वयंपाठी विद्यार्थी के रूप में ऐच्छिक विषय हिन्दी लेकर द्वितीय श्रेणी से दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् आपने दरबार उच्च माध्यमिक विद्यालय जयपुर से प्रथम श्रेणी में हायर सेकैण्डरी की परीक्षा उत्तीर्ण की । अपने पिता की प्रेरणा से वाणिज्य महाविद्यालय जयपुर से बी. कॉम. एवं तत्पश्चात राजस्थान विश्वविद्यालय से एम. कॉम. की परीक्षा पास की।

सन् 1982 में आपने पंजाब नैशलन बैंक में कार्य ग्रहण किया एवं नौकरी करते हुए एलएल. बी., सी. ए. आई. आई. बी., डिप्लोमा इन लेबर ला एण्ड पर्सनल मैनेजमेंट, सर्टिफिकेट इन रूरल बैंकिंग, सर्टीफिकेट इन कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, एम. ए. (हिन्दी), पीएच. डी. तथा डी. लिट्. की उपाधियां प्राप्त की। आपने भातखण्डे संगीत विद्यापीठ लखनऊ, अखिल भारतीय गांधर्र्व महाविद्यालय मण्डल मुम्बई तथा वृहद् गुजरात संगीत समिति अहमदाबाद की संगीत एवं नृत्य विशारद परीक्षाएं भी पास की।

विवाह और सन्तति—कैलाशचन्द्र शर्मा जी का विवाह 8 जून सन् 1982 को केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा के प्रो. डॉ. ईश्वर सिंह जी शर्मा की जयेष्ठ पुत्री रेनूरानी के साथ सम्पन्न हुआ। आपके एक पुत्री काजल और एक पुत्र अभिषेक है। दोनों ने कम्प्यूटर इन्जीनियरिंग की परीक्षा पास की है तथा दोनों ही संगीत, नृत्य एवं नाटक के प्रतिभाशाली कलाकार हैं। आपकी पत्नी श्रीमति रेनू जी त्रिवेणी कला संगम जयपुर की संस्थापक सदस्य एवं वर्तमान में अध्यक्ष हैं जबकि काजल और अभिषेक इस संस्था के प्रथम विद्यार्थी रहे हैं।

संघर्षमय जीवन—कैलाशचन्द्र शर्मा जी ने अपने छात्र जीवन को पूरा करने में जिस यातनामय संघर्ष को झेला, उसका स्वाद बहुत कड़वा है, फिर भी आपने किसी से याचना नहीं की। जब तक आपके पिता जी जीवित रहे तब तक उन्होंने आपकी शिक्षा के खर्चो की पूर्ति का पूरा-पूरा बन्दोबस्त किया। आपको यह भी पता था कि आपके पिता जी आपकी पढ़ाई के लिए आर्थिक साधन किन कठिनाइयों से जुटाते थे। उनकी इस तपस्या को आपने अपने पिता की जीवनी ‘कर्मयोगीÓ लिखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।

कैलाशचन्द्र शर्मा जी ने अध्ययन के समय काफी बाधाएं झेली फिर भी इन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में आपने किसी से याचना नहीं की । आपके पिता जी ने अपने जीवनकाल में आपके अध्ययन में आने वाली हर बाधा को दूर करते हुए आपको आगे बढऩे हेतु प्रोत्साहित किया।

आजीविका—कैलाशचन्द्र शर्मा जी ने अपनी एम. कॉम. की शिक्षा पूरी करने के पश्चात् जयपुर के एक प्राईवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य प्रारम्भ किया। इसके पश्चात् आपने कुछ समय आडवाणी एण्ड सन्स जयपुर (एक्सपोर्ट कम्पनी) में लिपिक का कार्य किया तथा वर्ष 1980 में राजस्थान वित्त निगम जयपुर में अस्थाई लिपिक के रूप में लगभग एक वर्ष तक कार्य किया। तत्पश्चात् दी गंगानगर केन्द्रीय सरकारी बैंक के प्रधान कार्यालय मेेंं एक वर्ष तक लिपिक के रूप में अपनी सेवाएं देने के उपरान्त 14 अगस्त 1982 में पंजाब नैशनल बैंक में लिपिक के रूप में कार्यग्रहण किया । वर्तमान में आप इस बैंक में वरिष्ठ अंकेक्षक के रूप में कार्यरत हैं। आपको कृषि कार्य करने का भी शौक है। ग्राम मैड़ में स्थित अपनी कृषि भूमि पर आप दो स्थाई नौकरों की सहायता से कृषि कार्य करवाते हैं।

साहित्य सृजन (रचना संसार)—कैलाशचन्द्र शर्मा जी ने अल्पायु में ही साहित्य सृजन करना प्रारम्भ कर दिया था। जब आप आठवीं कक्षा में पढ़ते थे तो विरोधी गुट के साथियों को चिढ़ाने के लिए तुकबन्दी किया करते थे, जो आपके वर्तमान लेखन का आधार बनी । आपने अपनी इस धरोहर को अपने काव्य-संग्रह ‘तरु णाईÓ में यत्र-तत्र प्रस्तुत किया है। आपकी सर्वप्रथम कहानी ‘चेहरे असली नकलीÓ एवं कविता ‘वस्तु-पात्र सम्बन्धÓ  वाणिज्य महाविद्यालय जयपुर की पत्रिका ‘व्यावसायिकाÓ में प्रकाशित हुई जिससे आपको प्रोत्साहन मिला और आप निरन्तर लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ते ही चले गये।

संगीत, नृत्य एवं नाटक—लेखन के साथ-साथ आपका व्यक्तित्व नाट्य एवं नृत्य विधा से भी जुड़ा रहा आपने जयपुर घराने के वरिष्ठï नृत्यगुरु स्व. श्री मांगीलाल जी पँवार से कत्थक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा लेने के बाद श्री राजेन्द्र गंगानी, स्व. श्री तीरथ राम आजाद तथा श्रीमती आशा जोगलेकर जैसे महान् गुरुओं से समय-समय पर कत्थक नृत्य की बारीकियां सीखकर न केवल अपने अनेक शिष्य शिष्याओं को कत्थक नृत्य की शिक्षा प्रदान की अपितु जयपुर, जोधपुर, भरतपुर गाजियाबाद आदि अनेक स्थानों पर अपनी शिष्य-शिष्याओं के साथ विभिन्न मंचों पर प्रस्तुतीकरण भी दिया। उल्लेखनीय है कि आपकी शिष्या श्रीमती रीना शर्मा ने इन्दिरा कला संगीत विशविद्यालय, खैरागढ़ की वर्ष 2003 की विश्वविद्यालय की बी.डान्स की योग्यता सूची में अखिल भारतीय स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त किया। नृत्य के क्षेत्र में आपके इस योगदान को कथक नृत्य गुरु श्रीमती आशा जोगलेकर एवं श्री राजेन्द्र गंगानी ने  ‘कर्मपथÓ (डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा का बहुआयामी सृजन) पुस्तक हेतु प्रस्तुत अपने आलेखों में उजागर किया है।

आपने अब तक लगभग डेढ़ दर्जन नाटकों की रचना की, उनके मंचन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी तथा नाट्य निर्देशन जैसे महान् दायित्व का भी निर्वहन अत्यन्त कुशलता से किया। अपने इन सुरूचीपूर्ण कार्यों को गति प्रदान करने हेतु आपने अपनी पत्नी श्रीमती रेनूरानी के सहयोग से सन् 1995 में त्रिवेणी कला संगम, जयपुर की स्थापना की जहां पर अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मण्डल, मुम्बई की संगीत अलंकार तक की परीक्षाओं के केन्द्र व्यवस्थापक के रूप में संचालन करना एवं वर्ष 2001 में त्रिवेणी संगीत महाविद्यालय, जयपुर की स्थापना कर उसमें इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की विद् डिप्लोमा एवं बी.डान्स तक की परीक्षाओं हेतु कत्थक नृत्य विषय का शिक्षण प्रदान कर परीक्षाओं का संचालन करना आपकी सांगीतिक अभिरूची का परिचायक है। 4 नवम्बर 1998 को आपके कुशल संयोजन में न्यू गेट से रवीन्द्र मंच, जयपुर तक एक अन्तर्राष्टï्रीय स्तर की विशाल संगीत रैली का आयोजन किया गया जिसमें देश-विदेश से लगभग सात सौ संगीत-विद्यार्थियों एवं संगीत प्रेमियों ने पद्मश्री विश्वमोहन भट्टï एवं संगीतज्ञ स्व. श्री नारयणराव पटवर्धन के नेतृत्व में सहभागिता की। आप अखिल भारतीय गांधर्र्व महाविद्यालय मण्डल, मुम्बई की संगीत एवं कत्थक नृत्य की विभिन्न परीक्षाओं के प्रायोगिक परीक्षक के रूप में भी संगीत एवं नृत्य जगत् को अपनी सेवाएं देते रहे हैं तथा राजस्थान विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग में समय-समय पर एम.ए. कक्षाओं के विद्यार्थियों को अवैतनिक अतिथि संकाय के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान की हैं।

मान-सम्मान (सम्मान एवं पुरस्कार)—कैलाशचन्द्र शर्मा जी बिना किसी प्रतिफल प्राप्त करने की आकांक्षा के निरंतर साहित्य, संगीत, नाट्य एवं नृत्यकर्म में सलंग्न रहे हैं। अपने सुरूचिपूर्ण कार्यों को मूर्त रूप प्रदान करने के उद्देश्य से आपने अपनी पत्नी श्रीमति रेनू रानी शर्मा के सहयोग से वर्ष 1995 में त्रिवेणी कला संगम की स्थापना की और उसकी छाया तले रंगमंच से जुड़कर अनेक नाटकों का प्रस्तुतीकरण किया, जिसके परिणामस्वरूप आपको राजस्थान कला केन्द्र भरतपुर द्वारा ‘कलाश्रीÓ, अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा ‘नाट्य कला सम्मानÓ तथा इण्डियन फार्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा ढूँढाड़ी बोली में किये गये शोधपरक कार्य एवं नाट्य क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों हेतु सम्मानित किया गया।

कार्यक्षेत्र (अभिरूचि)—कैलाशचन्द्र शर्मा जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी है अर्थात् आपका लेखन एक विधा तक सीमित नहीं रहा। आप कहानीकार होने के साथ-साथ नाटककार, उपन्यासकार और कवि भी हंै। लेखन के साथ-साथ रंगमंच और संगीत में भी आपकी रूचि रही है। आप सक्रिय रूप से रंगकर्म में संलग्न रहे हैं तथा कई नाटकों का निर्देशन एवं उनमें अभिनय किया है। संगीत के क्षेत्र में आपने वर्ष 1995 में त्रिवेणी कला संगम जयपुर एवं वर्ष 2001 में त्रिवेणी संगीत महाविद्यालय जयपुर की स्थापना की। आप अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल मुम्बई की संगीत अलंकार तक की परीक्षाओं के केन्द्र व्यवस्थापक एवं मण्डल के 67वें दीक्षांत समारोह के संयोजक रहे हैं। आप मंडल की संगीत अलंकार तक की परीक्षाओं के क्रियात्मक परीक्षक एवं मंडल के आजीवन सदस्य हैं। आपने विभिन्न प्रांतों में आयोजित संगीत सम्मेलनों एवं बैठको में सहभागिता की है।

 

आकृति एवं वेशभूषा—कैलाशचन्द्र शर्मा जी साधारण-सी कद-काठी वाले व्यक्ति हैं। यद्यपि आपका जन्म एक साधारण कृषक परिवार में हुआ है अत: आपकी आकृति से आपके ग्रामीण होने का अनुमान सहज रूप से लगाया जा सकता है। आपकी वेशभूषा सामान्य है। नौकरी पर जाते हुए आप पैन्ट-शर्ट पहनते हैं। पहनावे में किसी भी प्रकार का दिखावा आपको पसन्द नही है। जब आप अपने गाँव जाते है तो सफेद धोती-कमीज, सिर पर लाल पगड़ी एवं पैरों में बाड़ीजोड़ी की जूतियाँ पहनना आपको रूचिकर लगता है। संगीत एवं नाटक के कार्यक्र मों में सहभागिता के अवसर पर आप कुर्ता-पाजामा पहनते हैं। आप सक्रिय रंगकर्मी एवं कत्थक नृत्य के प्रदर्शनकारी कलाकार हंै, अत: कार्यक्रमों के प्रस्तुतीकरण के समय आप पात्रानुसार वेशभूषा धारण करते हैं।

खान-पान—कैलाशचन्द्र शर्मा जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी हैं। माँसाहार, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा आदि से आपको सख्त घृणा है। सामान्यतया आप चाय नहीं पीया करते, परन्तु छाछ-राबड़ी, बाजरे की खिचड़ी, लहसुन की चटनी एवं दाल बाटी चूरमा आदि आपको बेहद पसंद हैं।

स्वभाव—कैलाशचन्द्र शर्मा जी स्वभाव से विनम्र शिष्ट और मृदुभाषी हैं। आप मिलनसार व्यक्ति हैं। प्रत्येक कार्य को आप बड़ी गम्भीरता से लेते हैं। आपका जीवन अनुशासन के साँचे में ढ़ला है।

शालीनता—कैलाशचन्द्र शर्मा जी सादगी और सरलता की प्रतिमूर्ति हैं। जीवन में किसी भी प्रकार का दिखावा आपको पसन्द नहीं है तथा औपचारिकताओं से वे कोसों दूर हंै। आप अपनी बैंक की सेवा में भी एक सहज व्यक्ति के रूप में रहते हैं। आपको कभी भी पद का अभिमान नहीं रहा। यही कारण है कि जब आप प्रबन्धक के पद पर कार्यरत थे तो कई लोगों ने आपको अधिकारी की पदोन्नति के लिए तैयारी करने की सलाह दी।

स्वाभिमानी व्यक्तित्व—कैलाशचन्द्र शर्मा जी अपने पिता महन्त श्री गणेशदास जी महाराज की ही भांति स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आपने न तो अपने सिद्धांतों के विरुद्ध कोई कार्य किया और न ही अपनी परिस्थितियों को किसी के सामने उजागर किया। शायद इसी गुण ने आपको समान्य लोगों की पंक्ति से परे शीर्ष पर ले जाकर खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। जब किसी कठिन परिस्थिति से निपटने में आप स्वयं को असहाय महसूस करते तो सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया करते और तब निश्चय ही उस कठिनाई से आप आसानी से निजात पा लिया करते।

पुरुषार्थ एवं आशावाद—कैलाशचन्द्र शर्मा जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका आशावादी होना है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आप आशा, विश्वास और पुरुषार्थ से परिपूर्ण रहते हैं, तभी तो आपका लेखनकार्य निरन्तर जारी है। हमने हालातों और परिस्थितियों की मार से टूट कर अनेक लेखकों को राह छोड़ते हुए देखा है या फिर गहरी निराशा और अवसाद के दौर से गुजरते हुए। परन्तु कैलाशचन्द्र शर्मा जी आशावादी हैं और आप में परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता है।

दृढ़ इच्छा शक्ति—कैलाशचन्द्र शर्मा जी दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न एक कर्मठ इन्सान हैं। जब आपके मन में किसी कार्य को करने की इच्छा उत्पन्न होती है तो आप तब तक चैन की साँस नहीं लेते जब तक कि उस कार्य की सिद्धि न हो जाए। इस मार्ग में आने वाली किसी भी प्रकार की कठिनाई से आप तनिक भी विचलित नहीं होते। आपका मत है कि डूबता हुआ व्यक्ति यदि डरकर जीने की उम्मीद खो बैठता है तो वह जरूर डूबेगा। पर ऐसे समय में किसी के जीने की इच्छा बलवती हो तो शायद वह बच सकता है। इस सम्बन्ध में आपके तरु णाई काव्य संग्रह की कविता ‘पथ के राहीÓ खरी उतरती प्रतीत होती है-

‘जाग उठ इन्सान पल-पल बीतता जाता, राह है सुनसान इस पर क्यों नहीं आता।

रित नाटक कर इसे आबाद क्यों तू सो रहा पगले, धैर्य मन से धार राही राह पर चल दे। ………….Ó1

प्रकृति प्रेमी—कैलाशचन्द्र शर्मा जी का जन्म एक ऐसे गाँव में हुआ जो प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित है। आपका निवास स्थान सियावरजी का मन्दिर बाणगंगा नदी के तट पर स्थित है,जहां पर खजूर, आम, जामुन आदि के हजारों पेड़ सैकड़ों वर्षों से स्थिर रूप से खड़े हैं। मोर, पपीहे, कोयल,चिडिय़ाओं की चहचाहट एवं गाय, भैंस, बछड़ों के रंभाने का स्वर निरन्तर रूप से आपको आनन्दित करता है, जो आपके दूंढाड़ी गीतों, कविताओं, कहानियों, नाटकों एवं उपन्यासों में देखा जा सकता है।

सृजन की प्रेरणा—डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा जी को साहित्य सृजन की प्रेरणा अपने जन्म स्थान के इस प्राकृतिक वातावरण एवं स्कूल के सहपाठियों से मिली जिसके परिणामस्वरूप आपने अपनी प्रारम्भिक कविताएं एवं कहानियाँ लिखी। जीवन में पग-पग पर आपको कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो आपके लेखन के आधार बने। इस बात को आपनेअपने काव्य संग्रह ‘तरु णाईÓ में अभिव्यक्त भी किया है।

वर्ष 1995 में त्रिवेणी कला संगम जयपुर द्वारा आयोजित बाल नाट्य प्रशिक्षण शिविरों हेतु अच्छे नाटकों की कमी ने आपको नाटक लिखने हेतु प्रेरित किया तथा वर्ष 2005 में भरतपुर की कत्थक नृत्य की उनकी शिष्या श्रीमती रीना शर्मा ने आपको ढंूढाड़ी गीत लिखने हेतु प्रेरित किया जिनका आगे चलकर आपने अपने नाटकों के मंचीय प्रस्तुतीकरण में समायोजन किया। आपने रीना शर्मा के घर पर अपना प्रथम गीत ‘टर्रैÓ लिखा तथा आगे चलकर उनकी शिष्या ज्योति कटारा के सहयोग एवं प्रेरणा से ढूँढाड़ी गीतों का सृजन एवं ध्वनि संयोजन किया जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 2007 में आपके ध्वनि संयोजन में ‘त्रिवेणी कैसेट-सी. डी.Ó जारी हुई।

कृतित्व

हिन्दी साहित्य के प्रबुद्ध साहित्यकार कैलाशचन्द्र शर्मा जी की साहित्य यात्रा विभिन्न कृतियों, जैसे कहानी, नाटक, उपन्यास, काव्य,जीवनी जैसी विधाओं से होकर गुजरती है। इनकी सफलता और प्रसिद्धि लेखक के लेखन कर्म की सार्थकता को सिद्ध करती है तथा श्रेष्ठता को भी स्थापित करती है।

 

नाटक

कार्यवाहक हलवाई , नामकरण , अ$फसर का कुत्ता, मन चंगा तो कठौती में गंगा, लड़ी मैड़ की, तुक्के का बादशाह, पेड़ हमारे मित्र, छोटा बेगारी, जैसे को तैसा, जंगल मित्र, कंस , आधुनिक यमलोक, वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान, देख जात के ठाठ, मानवता की पुकार, मेरी लाडो पढ़ेगी, अग्निभूत।

उपन्यास

अभिव्यक्ति, विरह का इन्द्रधनुष

कहानियाँ

‘अबला की मंजिलÓ कहानी-संग्रह—अबला की मंजि़ल, माधवी, साक्षात्कार, मौन समर्पण, चेहरे असली-नकली, नवजीवन, कजऱ्, दीपक की रोशनी, पैमाना, भटकती आत्मा, ताबीज़

‘ओवरकोटÓ कहानी-संग्रह—ओवरकोट, रींछ भगवान, बोरे की लाश, खान दोस्त, भिखारिन माँ, बछड़े की अरदास , उपकार का बदला , सवारी का मोह, स्वाभिमान

जीवनी

कर्मयोगी

शोध प्रबन्ध

नरेश मेहता का गद्य साहित्य (पीएच. डी.)

हिन्दी मराठी नाटकों का रंग वैशिष्ट्य :समकालीन भारतीय संदर्भ(डी.लिट् ़)

समीक्षा

मोहब्बत का सफरनामा (कवि श्री जगदीशचन्द्र पण्ड्या की गज़लों की पुस्तक)।

हादसों के संस्करण (मराठी रंगकर्मी एवं अभिनेता श्री विजय कदम की पुस्तक ‘हलकं फुलकंÓ)।

सम्पादन

स्मारिका—त्रिवेणी कला संगम जयपुर, वर्ष 1995 एवं 1998 पी.एन.बी. सन्देश (पंजाब नैशनल बैंक, जयपुर अँचल की गृह पत्रिका)

बैंक ज्योति (बैंक ऑफ बडौदा के संयोजन में जयपुर बैंक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, जयपुर की गृह पत्रिका)

अन्य ग्रन्थ

आधुनिक परिदृश्य में मानव संसाधन विकास एवं प्रबन्धन (पुरस्कृत)

भारतीय रंगमंच शास्त्र एवं आधुनिक रंगमंच

खण्डकाव्य

सन्तोषी माता

लेख

देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में साहित्य, संगीत, नाटक एवं लोक कला सम्बन्धी विषयों पर लेखों का प्रकाशन।

कविताएँ

काव्य संग्रह ‘तरुणाईÓ एवं अन्य कविताओं सहित लगभग 60 कविताओं का सृजन।

गीत

126 ढूंढाड़ी गीतों का सृजन एवं ध्वनि संयोजन। 50 ढूंढाड़ी गीतों की विषयवस्तु एवं भावार्थ का अंग्रेजी अनुवाद।

कत्थक एवं लोकनृत्य प्रस्तुतीकरण

रवीन्द्र मंच जयपुर, यूथ हॉस्टल जोधपुर, वी.एन. भारतखण्डे संगीत महाविद्यालय गाजियाबाद आदि स्थानों पर एकल एवं युगल प्रस्तुतीकरण।

डायरी

वर्ष 1980 में बम्बई प्रवास के दौरान लिखित।

प्रदर्शनात्मक व्याख्यान

भारतीय संगीत, नाटक एवं लोक कला विषय पर आई. सी. सी. आर. नई दिल्ली हेतु प्रदर्शनात्मक व्याख्यान की वीडियो सी. डी. का निर्माण।

रंगमंच प्रस्तुतीकरण एवं निर्देशन

सक्रिय रूप से रंगकर्म में संलग्न। कई दर्जन नाटकों में अभिनय एवं उनका निर्देशन। सदैव नई टीम को लेकर सफल रहने वाले निर्देशक के रूप में जयपुर रंगमंच के ख्यात कलाकार।

दूरदर्शन प्रसारण

13 जनवरी 1997 को जयपुर दूरदर्शन के ‘नन्हीं दुनियाÓ कार्यक्रम में आपके नाटक ‘पेड़ हमारे मित्रÓ का प्रसारण।

श्री संजय दत्त माथुर के निर्देशन में 27 जुलाई 2008 को जयपुर दूरदर्शन के ‘कल्याणीÓ धारावाहिक की आपकी जन्मभूमि गाँव मैड़ में की गयी रिकॉर्डिंग में आपका सराहनीय अभिनय जिसके प्रसारण को काफी सराहना मिली।

18 नवम्बर 2009 को श्री शैलेन्द्र उपाध्याय के निर्देशन में जयपुर दूरदर्शन के ‘मरूधराÓ कार्यक्रम में आपके नवसृजित ढूँढाड़ी गीतों में ग्राम्य जीवन एवं दर्शन सम्बन्धी आपसे हुई प्रभावशाली वार्ता के 16 दिसम्बर 2009 को हुए प्रसारण को काफी सराहा गया।

डॉ. वासुदेव शर्मा के निर्देशन में जयपुर दूरदर्शन के ‘नन्हीं दुनियांÓ कार्यक्रम में ‘नाट्यकला का व्यक्तित्व निर्माण में योगदानÓ विषय प्रसारित किये गये साक्षात्कार का 20 फरवरी 2010 को प्रसारण।

5 फरवरी 2011 को डॉ. वासुदेव शर्मा एवं श्री राजकिशोर के निर्देशन में जयपुर दूरदर्शन के ‘नन्हीं दुनियाÓ कार्यक्रम में ‘मेरी लाड़ो पढ़ेगीÓ नाटक का प्रसारण।

ऑडियो कैसेट- सी. डी.

11 फरवरी 2007 को कैलाशचन्द्र शर्मा जी के निर्देशन-स्वर संयोजन में उनके द्वारा लिखित ढूँढाड़ी गीतों की ‘त्रिवेणी कैसेट- सी. डी.Ó शृंखला का लोकार्पण ‘जयपुर तमाशाÓ के मूर्धन्य कलाकार स्व. श्री गोपीकृष्ण भट्ट द्वारा किया गया।

शोधकार्य

आपके गीतों पर कला भारती अलवर के निदेशक श्री सुधीर माथुर द्वारा राजस्थान विश्वद्यालय के संगीत विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं ललितकला संकायाघ्यक्ष प्रोफेसर मायारानी टाक के निर्देशन मे पीएच.डी. हेतु शोधकार्य किया गया है। कुरुक्षेत्र विश्वद्यालय में आपके साहित्य पर एम.फिल. हेतु निम्नानुसार शोधकार्य सम्पन्न हुए हैं :-

  1. नाटककार कैलाशचन्द्र शर्मा

शोधकर्ता : जोगेन्द्र, निर्देशक : डॉ. बाबूराम, वर्ष 2008

  1. अभिव्यक्ति उपन्यास में स्त्री मनोविज्ञान

शोधकत्र्री : कविता, निर्देशिका : डॉ. आशा अहलावत, वर्ष 2009

  1. कहानीकार कैलाशचन्द्र शर्मा

शोधकत्र्री : सुखविन्द्र, निर्देशिका : डॉ.(श्रीमती) नरेश जोशी, वर्ष 2009

इसके अतिरिक्त राँची विश्वद्यालय में आपके काव्य एवं गद्य साहित्य पर निम्रानुसार पीएच.डी. हेतु शोधकार्य प्रगति में हैं-

  1. डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा के काव्य में कला, संस्कृति एवं ग्राम्य जीवन शोधकर्ता : हरद्वारी लाल शर्मा, निर्देशिका : डॉ. यशोधरा राठौर
  2. डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा के गद्य साहित्य का विवेचन

शोधकर्ता : कुलदीप, निर्देशक : डॉ. रतन प्रकाश

निष्कर्ष

कैलाशचन्द्र शर्मा जी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार हैं। इन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। कहानी, नाटक, उपन्यास, कविताएँ, जीवनी आदि लिखकर अपनी विशिष्टता का परिचय दिया है। कैलाशचन्द्र शर्मा जी का समस्त जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ है, फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी और जीवन पथ पर आगे बढ़ते गये। इन्होंने देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में साहित्य,संगीत, नाटक व लोक कला सम्बन्धी विषयों पर लेख लिखे तथा साथ ही दूरदर्शन से भी जुड़े रहे हैं। इनके द्वारा लिखित कई नाटकों का जयपुर दूरदर्शन से प्रसारण हुआ। लेखन के साथ-साथ रंगमंच प्रस्तुतीकरण, निर्देशन एवं संगीत में भी इनकी रूचि रही है। ये सक्रिय रूप से रंगकर्म में संलग्न रहे हैं। इन्होंने कई नाटकों का निर्देशन एवं उनमें अभिनय भी किया है। इन्होंने त्रिवेणी कला संगम एवं त्रिवेणी संगीत महाविद्यालय, जयपुर की स्थापना की। विभिन्न प्रान्तों में आयोजित संगीत सम्मेलनों व बैठकों में इनकी सहभागिता रही है। वर्ष 2003 में हिन्दुस्तानी एकेडमी एवं नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इण्डिया द्वारा इलाहाबाद में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘श्री नरेश मेहता का कथा साहित्यÓ विषय पर किया गया आपका पत्रवाचन सराहनीय रहा।

इस प्रकार कैलाशचन्द्र शर्मा जी ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं, जिन्होंने लेखन, मंचन, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में अपना लोहा मनवाया है। एक व्यक्ति में इतना सब कुछ मिलना कठिन ही नहीं, अंसभव है।

(कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एम.फिल. लधु शोध प्रबन्ध : कहानीकार कैलाशचन्द्र शर्मा, से साभार)

डॉ कैलाश चन्द्र शर्मा का संपर्क सूत्र :

मोबाइल – + 9 18890293185

ई मेल – trivenikalasangam@gmail.com, trivenikalasangam@yahoo.com