VILLAGE MAID

राजस्थान का मैड़-विराट अँचल : एक पचिय

मैड के पास  स्थित बीलवाडी की मिट्टी-कला एवं मैड के बुहारी, भीजणे, टोकरे आदि का बाज़ार : वीडियो दिनांक 19.11.14      

(।) भौगोलिक स्थिति

महाभारतकालीन ‘मत्स्य’ देश का राजधानी अँचल मैड-विराटनगर अपने पाँच सहस्त्र वर्ष  पूर्व के इतिहास को तथा अपनी प्राकृतिक मनोरमता एवं अनेक संस्कृतियों की सामंजस्यमयी भग्न कृतियों को अपने अन्तराल में छुपाये राजस्थान के जयपुर मण्डल में दिल्ली-अजमेर राजमार्ग पर (अलवर-जयपुर के मध्य) अर्बुद महापर्वतमाला की गोद में आज भी विद्यमान है।

महाभारत के अनुसार यह क्षेत्र ‘इन्द्रप्रस्थ’ से पश्चिम में, मरूभूमि और ‘पुष्कर राज्य’  से पूर्व में, शूरसेन राज्य, मथुरा से उत्तर-पश्चिम में एवं कुरुजांगल ‘कौरव’ राज्य से दक्षिण दिशा में था। यह वर्णन वर्तमान मैड़-बैराठ पर खरा उतरता है। विराटनगर के पास से उत्तर और दक्षिण भारत को जोडऩे वाला परम्परागत राजमार्ग है, जो आगे चलकर ‘बाणगंगा ‘   तक जा पहुंचता है।

वर्तमान राजस्थान के ऐतिहासिक नगर मैड़-विराटनगर राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में 27० 4  28० 4 दक्षिणी अक्षांश एवं  76० 7 एवं  77० 7 पूर्वी अक्षांश के मध्य में स्थित है। यह अँचल प्राचीन मत्स्य जनपद का निकटवर्ती क्षेत्र है।  इस क्षेत्र में इमारती पत्थर, रोड़ी, चूना पत्थर, स्लेट, ताँबा एवं मार्बल पाया जाता है।

(।।) ऐतिहासिक विवेचन

ग्राम मैड़ के समीपस्थ कस्बे बैराठ (विराटनगर) में प्राचीनकालीन 36 सिक्के मिले हैं तथा बौद्घकालीन आठ  विहार मठों के अवशेष हैं। ग्राम मैड़ में भी मठ का मन्दिर एवं उसके आस पास बसी मठों की ढाणी इस ऐतिहासिक तथ्य का प्रमाण हैं।  मैड़-विराट अँचल सम्राट अशोक के राज्य के अन्तर्गत रहा है। इस अँचल में प्राप्त सिक्के यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में ग्रीक एवं यवनों का शासन भी रहा है।  छठी शताब्दी ए.डी. से 12 वीं शताब्दी ए.डी. तक यह गूर्जर प्रतिहारों के राज्य का भाग रहा। सातवीं शताब्दी ए.डी. में चीनी यात्री ह्वïेनसांग ॥ह्वद्बद्गठ्ठह्लह्यड्डठ्ठद्द ने नारायणपुर तथा मैड़-विराटनगर होते हुए मथुरा तक की यात्रा पूरी की। इसके पश्चात् 1008 ए.डी. में मोहम्मद गजनवी ने भी नारायणपुर, तालवृक्ष मैड़-विराटनगर, मुण्डावर एवं राजगढ़ की यात्रा की। इस अँचल में प्राचीन काल से ही कला एवं पेन्टिग, आभूषण निर्माण, रंगाई आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।

मैड़ गाँव

महाभारतकालीन दुराचारी कीचक, कैकय का सबसे बड़ा पुत्र, राजा विराट का साला एवं रानी सुदेष्णा का भाई था जिसे मेहर नाम से जाना जाता था। उसका निवास स्थान विराटनगर के  पास ही में स्थित मैड़ गाँव बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मेहर का यही नाम कालान्तर में मैड़ हो गया।

यह प्रदेश पवित्र है। यहां पर बड़े-बड़े ऋषि-तपस्वियों का पदार्पण हुआ है। पाण्डवों ने इसी धरा पर अपने अज्ञातवास का समय व्यतीत किया था और उन्होंने अज्ञातवास में जाने से पूर्व जिस शमी वृक्ष पर अपने हथियार टांगे थे  तथा जिस पर भगवान इन्द्र ने सोने की वर्षा की थी वह वृक्ष यहीं बाणगंगा नदी के तट पर स्थित था।

मैड़ अति प्राचीन गाँव है तथा यह माना जाता है कि वर्तमान अलवर की स्थापना ग्राम मैड़ के ही निवासी एक कछवाहा राजपूत श्री अलदूराय ने अलूर नाम से की थी जो कालान्तर में अलवर के नाम से स्थापित हो गया। मैड़ गाँव में मन्दिर बहुत हैं जिनमें श्री सियावरजी का मन्दिर, श्री झूमका, श्री गोपीनाथ जी, श्री गुसाईं जी, श्री जानकी नाथ जी, श्री नृसिंह जी, श्री मुरली मनोहर जी, श्री बिहारी जी, राधाकान्जी, आदि के मन्दिर प्रमुख हैं। गाँव के एक कोने में राजपूतकालीन एक विशाल किला है जिसके चारों ओर खाई बनी हुई थी जिसमें सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से पानी भरा होता था। कभी यह किला राजा का निवास स्थान रहा होगा परन्तु आज इसमें सरकारी स्कूल चलाया जा रहा है। भामोद के राष्ट्रीय शिक्षक श्री कन्हैया लाल शर्मा द्वारा स्थापित संस्कृत विद्यालय सर्वप्रथम राधाकान्जी के मन्दिर में स्थापित किया गया जिसे कुछ समय बाद श्री झूमका मन्दिर में स्थानान्तरित कर संचालित किया गया और अब यह विद्यालय राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय के नाम से बड़ी सेढ माता के पास चल रहा है। इस गाँव के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल एवं इमारतों में कीचक का स्तम्भ, मठों की ढाणी, श्योलाल का चबूतरा, बाणगंगा तट पर स्वामी श्री गोपाल दास की छतरी,पहाड़ी पर साधू बाबा की गुफा, महात्मा श्री रामचन्द्र वीर के पूर्वजों की काली कोटड़ी, छोटी-बड़ी सेढ़ माता, पथवारी माता, गधाखोळ, श्री सियावरजी के मन्दिर स्थित महात्माओं की धूणी, ठण्डे पानी की प्याऊ आदि प्रमुख हैं।

इस गाँव में स्वामी श्री गोपालदास एवं उनके छोटे भाई माधवदास जी, महन्त श्री गणेश दास, गिरूडी वाले श्री माधव दास जी जैसे सन्तों ने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव जाति के हित में अर्पित कर दिया। श्री झूमका मन्दिर के महन्त श्री सीताराम दास महान् विभूति थे परन्तु अपने जीवन की आधी यात्रा में ही वे यहां की परिवर्तित व्यवस्थाओं से व्यथित होकर सीकर जिले के अमरसर नामक गाँव में चले गये और उन्होंने वहां पर ही देह त्याग किया।

मैड़ गाँव के बाज़ारों में भीजणी बाजार(तल्ला बाज़ार), चौहट्टा बाज़ार, छतरी का बाज़ार, आड़ीसील बाज़ार आदि प्रमुख हैं। यह गाँव स्वामी श्री रामचन्द्र वीर, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी श्री रामदास जी अग्रवाल आदि के पूर्वजों की भूमि है।

कवित्त

(इस कवित्त में ग्राम मैड़ के मन्दिरों एवं वहाँ की प्राकृतिक छटा को   सजीव रूप में उकेरा गया है)।

राधेकन्त 1 भगवन्त जिन्होंके बाम भाग वृषभान ललित

चहुं ओर मन्दिर अति सुन्दर मानो वृन्दावन कुंज गली

मोर मुकुट मुख मुरली बाजे कानन कुण्डल झलाझली

पाँचों पाण्डव गरुड विराजैं एकादशि शिव शोभा भली

नंद कुण्ड 2 वृक्षन के झुण्ड जहाँ विराजमान हनुमंत बली

मठ 3 माहीं नृसिंह विराजैं शीतल धारा गंग चली

तटि तटि मन्दिर सुन्दर शोभित होई जहाँ बहु रंगरली

गंग बिहारी 4 शोभा भारी सीताराम संग जनक लली

बाळ नदी तट राम सियावर 5 फूल रही जहाँ चँप कली

सघन घटा वन की अति सुन्दर जहाँ संतन की धूणी जली

गुप्त प्रकट जहाँ संत देव द्विज दर्शन से दुविधा जो टली

स्नान करो रघुनाथ झूमके 6 गंग घाट पर मुक्ति मिली

(कवित्त के शब्दार्थ     : 1 पाण्डवों का मन्दिर   2 अँधेरी-चाँदनी कुण्ड     3 मठ का मन्दिर       4 श्री बिहारी जी का मन्दिर१ 5 श्री सियावरजी का मन्दिर 6 श्री झूमका मन्दिर) स्रस्र)

समर्थ रामदास जी का मैड़ गाँव में आगमन

छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रेरक एवं पथप्रदर्शक, हिन्दूपदपादशाही अथवा अखण्ड हिन्दूसाम्राज्य के स्वप्नदृष्टा, राष्ट्रगुरु समर्थ रामदास जी महाराज अपनी उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पाश्र्ववर्ती पुण्य सलिला बाणगंगा नदी में स्नान करने हेतु जब ग्राम मैड़ पधारे तो इस गाँव के पुण्यात्मा सन्त स्वामी श्री गोपाल दास के यहां रुके।  समर्थ रामदास ने उनका आतिथ्य स्वीकार कर स्वामी श्री गोपालदास के समक्ष बाणगंगा नदी में स्नान करने की इच्छा प्रकट की। गोपालदास जी ने उनका चरणोदक लिया और भक्ति भावना से उनके चरणों में नूतन पादुकाएं समर्पित की। श्री स्वामी समर्थ ने उनका मान रखने के लिये पादुकाएं ग्रहण की, बाणगंगा नदी में स्नान किया और वे पादुकाएं प्रसादस्वरूप गोपालदास जी को ही प्रदान कर दी। स्वामी श्री गोपालदास ने  समर्थ रामदास जी को मैड़ गाँव एवं आस-पास के क्षेत्र में घुमाया तथा उसके पश्चात् उन्हें विराटनगर क्षेत्र भी दिखाने ले गये। समर्थ श्री रामदास जी महाराज का हृदय औरंगजेब द्वारा ध्वस्त देवालयों को देखकर आहत हो गया।

नायला पर मैड़ के शेखावतों का राज

मैड़ का किला

मैड़ गाँव के बीचोंबीच पठार पर एक किला है जो जयपुर राज्य की सेना की एक प्रमुख छावनी रहा है। इस किले के चारों ओर गहरी खाई है। प्रारम्भ में यह किला अलवर जिले के निर्माता महाराजा प्रताप सिंह के साम्राज्य का हिस्सा रहा परन्तु बाद में जयपुर राज्य के अधीन आ गया। यह किला जयपुर के नन्दराम बक्षी ने बनाया और सन् 1868 में जयपुर के शासकों ने इसकी मरम्मत करायी।

नौ बिस्वा की कोटड़ी

मैड़ गाँव के मध्य में राजपूतों का निवास स्थान, प्राचीन नौ बिस्वा की कोटड़ी है। बिस्वा भूमि की माप का एक प्रकार है और एक बिस्वा में 2500 बीघा भू क्षेत्र माना जाता है।

मैड़ गाँव- कहावत, अन्तर्कथा एवं उक्तियों के सन्दर्भ में

मैड़ गाँव में अनेक कहावत, अन्तर्कथा एवं उक्तियां प्रचलित हैं जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं:-

* मैड नगर मथुरापुरी, डण्डोतां का ढेर।
कथा बांच पूरी करी , आटो आयो न सेर ।।
*      बेटा हुया स्याणा अर दाळद हुया पुराणा

(सन्तान के योग्य हो जाने पर घर का दारिद्र्य स्वत: ही समाप्त हो जाया करता है)।

*      बीघै भूत अर बिस्वै साँप

*      खैडे मैड़ कांकै भरोसै राण्ड मत व्है जाजे ए

(मैड़ के निवासियों के चक्कर में आकर कहीं विधवा मत हो जाना)।

अन्तर्कथा

किसी समय की बात है। मैड़ गाँव का एक व्यक्ति पास ही के एक अन्य गाँव की एक सुन्दर महिला पर आसक्त था……….. (पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

 

*      तेरी नानी का नानेरा मैं ढूंढ घालूं

(किसी का कहना न मानने वाले लड़के या जुताई कर रहे बैलों के अनुशासन में न रहने पर उसके वाहक द्वारा खीझ के साथ उन्हें दी जाने वाली एक प्रकार की गाली)।

*      खेती धण्यां सेती

*      कर ये माली मालपुआ अर बोरो लेगो हुया हुया

(कजऱ् करके गुलछर्रे उडाना)।

*      हाथ कमाया कामड़ा अर दई नै दीजे दोष

(मनुष्य स्वयं $गलती करे और उसका दोष भगवान को देना चाहे)।

*      गोडा टूट्या कड़ नई अर सिर पर पान चर्या

(बलशाली व्यक्ति की दीन अवस्था में निर्बलों द्वारा उसे प्रताडित करना)।

अन्तर्कथा

जंगल के सभी जानवर अपने राजा शेर से इतने डरते थे कि उसके पास तक आने की उनकी हिम्मत न होती थी ……..(पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

*      शिंवाळा मैं सुस्यो द्यूं फेरां मैं द्यूं बूच

कन्यादान मैं लोमड़ी द्यूं जींको लम्बो पूँछ

*      मर्यां धणी अर बिक्यां गायक

*      तोतूकां की छतरी अर धोधूकां की धूळ

*      मारवाड मंसूबो डूब्यो दक्खिण डूब्यो गाबा मैं

*      लेट निठारो लाखणी अर लोचू को बास

अमरसर का मसखरा थांको जाओ सत्यानाश

*      बळद सींगलो अर मरद मूंछलो

*      कसकर बाँधै पागड़ी गरड़ कटावै नख,

ओछी पैरै मोचड़ी यै बिनां लिख्यां का दु:ख

(यदि कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता या क्षमतानुरूप आचरण नहीं करता तो वह सदा दुखी रहेगा)।

*      एक पत्नी अपने पति को तम्बाकू पीने से रोकते हुए उससे कहती है-

होठ जळैं छाती जळै जळैं बत्तीसों दँत

हाथ जोड कामण कहै छोड तम्बाकू कंत

उसका पति उसे तम्बाकू के गुण बताते हुए कहता है-

बाय हडै बादी हडै कफ खाँसी ले जाय

इतना गुण हुक्को करै छोड्यो कैसे जाय

*      विवाह के अवसर पर वधू पक्ष की औरतों एवं वर द्वारा बोले जाने वाले श्लोक

* छाबडी मैं छाबडी छाबडी मैं जीरो

जान आई चानणी जवाँई म्हारो हीरो

* साळा साळाहेली को राम-सीता सो जोडो

आगै श्लोक जद बोलां जद एक द्यो घोड़ो

हरबोलों की वाणी

हर बोल, बस्ती माता की जय,

पंच पटैलां की जय, जती सती की जय

दान दाता की जय, सेठ साहूकार की जय

हरबोल हरबोल…….

* डाकोतों की फेरी

मकर संक्रान्ति के लगभग पन्द्रह-बीस दिन पूर्व से ही ज्योतिषी लोग प्रात:काल चार-पाँच बजे उठकर  गाँव में फेरी लगाया करते जिसमें सामान्यत: दो व्यक्ति धर्म एवं नीति की बातें, कहावतें या उक्तियां पद्य रूप में गाते चलते……

1      हरे कृष्ण जी हरे मुरार हर सुमरे उतरेंगे पार        हरे हरे

4      सियावर हडमान जी कष्ट हरीं सबका छीं जी        हरे हरे

13     भरी चालणी देवो ल्याय चल पीड़ा पापी कै जाय     हरे हरे

17     रूल्या की माँ राँधी दाळ रूल्यो कूदै नौ-नौ ताळ     हरे हरे

20     डाकोतां की फेरी या पूरी व्हैगी म्हे चाल्या   हरे हरे  हरे हरे…….

(पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

*      जागा-पोथी

‘जागाÓ एक जाति विशेष का नाम है जिसका मुख्य कार्य सामाजिकों के जन्म-मृत्यु आदि धार्मिक अवसरों पर किये जाने वाले धार्मिक कार्यों का लेखा-जोखा रखना होता है ……….

जागाओं की इस पोथी को ‘जागा पोथीÓ के नाम से जाना जाता है जिसका एक नमूना प्रस्तुत है –

राम प्रताप जी कै दो बेटा               हूं…….

दसवीं पीढ़ी पैली दो बेटा

खीर-पूड़ी सूं जिमाया मैड़ कै खेड़ै  मैड़ कै खेड़ै

एक मोहर एक घोड़ी दक्षिणा मैं दीनी       हूं…….

रामकिशन जी कै तीन बेटा

हरनारायण, दीनदयाल अर  रामनारायण हुया हूं…….

चूरमा दाळ बाटी सूं जिमाया बैराठ कै खेड़ै  बैराठ कै खेड़ै

एक मोहर एक ऊंट दक्षिणा मैं दीन्यो      हूं…….

………………….. और इस प्रकार जागा अपने यजमानों की वंशावली लिखता जाता था।

(पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

मौसमी की कहावतें

*             आसोजां का तावडा अर जोगी बण गया जाट

(आसोज मास में जब तेज धूप पड़े तो जाट जैसी परिश्रमी जाति तक के लोग खेतों में डटे रहने का साहस नहीं कर पाते जिसके परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति बिगडने के कारण उन्हें भी किसी से गुजारे के लिये धन मांगना पड सकता है)।

*             बास्योडा की राबडी अर गणगोर्यां का गुणा

सदा मीठी लापसी अर सावण मीठा चणा

फाळियां (पहेलियां)

*      अजा सहेली तासु रिपु सा जननी भरतार

ता के सुत के मित्र को भजिये बारम्बार

(विस्तृत विवरण पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

*      एक औरत मटका लेकर नदी में से पानी भरने के लिये जा रही थी। उसे रास्ते में एक पण्डित रोटी सेंकता हुआ मिला। औरत ने पण्डित की परीक्षा लेने के उद्येश्य से कहा-

लाम्बी लाम्बी छतरी बणी छोटा छोटा अण्डा

ईं को अर्थ बतार ही रोटी करजे पण्डा

पण्डित भी कम न था अत: पलटवार करते हुए औरत से कहा-

लाम्बी लाम्बी छतरी बणी छोटी छोटी मोरी

ईं को अर्थ बतार ही पाणी भरजे गौरी

उनके इस सवाल-जवाब की प्रक्रिया में औरत और पण्डित दोनों ठगे से खडे थे। न पण्डित रोटी सेंक रहा था और न ही वह औरत पानी भरने के लिये जा रही थी। उन्हें इस अवस्था में देखकर उधर से गुजरते हुए एक राहगीर ने उनसे    कहा-                        वांकै खायां हाथी घूमै वांकी चालै घाणी

तू तो पण्डा रोटी कर लै तू भर ल्यारी पाणी

राहगीर की बात से पण्डित एवं पनिहारिन दोनों सन्तुष्ट होकर अपने-अपने काम में लग गये।

(विस्तृत विवरण पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

*      एक स्त्री और एक पुरुष ऊंट पर बैठकर जा रहे थे। पुरुष बूढा था और स्त्री जवान। राहगीर औरतों ने ऊंट पर बैठी स्त्री से पूछा-

ऊंट चढी लजवंती जोय आगडलो थारो कांईं होय?

उस स्त्री ने तो कोई जवाब नहीं दिया परन्तु ऊंट पर बैठे वृद्ध ने उसे ऐसा कहा-

ईंकी सासू मेरी सासू आपस मैं माँ-बेटी

(विस्तृत विवरण पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

मैड़ गाँव के बालकों की दुनिया : खेल, कहावतें एवं उक्तियां

*      मदन मदारी, तेल की तगारी

तगारी मैं तोतो मदन मेरो पोतो

बच्चों के खेल

 

चोर ढूंढना

*      चोर चोरी तो करी, जूती जरी की रह्ई

साफा अड्डेदार है, पजामा पट्टेदार है

पकडल्यो ये बादश्याह का वजीर चोर है

बन्द मुट्ठी में क्या

*      अक्कड बक्कड लोखी टक्कड ठां ठूं

अतूल बतूल गौरीशंकर पान फूल

*      सबसे छोटी कहानी

एक लड़का-                   एक बकरी छी

सुनने वाला लड़का-      हां

कहने वाला लड़का-      बात अतरी छी

*      मछली का खेल

*      राजा राड

*      नौकांट्यो

*      मियां जी की घोड़ी

*      भूत्या की चाँदणी

*      मुकड़ी चढाना

*      हूस फूस का खेल

*      तोते का खेल

*      कडकडबेल

यह खेल होली के दिनों में खेला जाता था। इसमें एक बच्चा माली बनता और बाकी सभी बच्चे एक गोला बनाकर ज़मीन पर बैठ जाया करते। माली बना हुआ बच्चा उन बैठे हुए बच्चों के चारों ओर चक्कर लगाते हुए कहता- ……..

ज़बान साफ करने की युक्ति

बच्चे बोली की तुतलाहट या ज़बान की अटक निकालने हेतु निम्न पंक्तियों को धीमे से तीव्र क्रम में अबाध गति से बोलने का अभ्यास किया करते-

धीमी गति      टाटी मैं सूं ताकू काढूं तांक ताकू टाटी मैं    (3-4 बार)……..

*      मैड़ गाँव की प्रसिद्ध चार चीज़ें

मैड़ गाँव में बच्चों द्वारा गाया जाने वाला चतड़ाचोथ का गीत

‘गणेश चतुर्थी’ को ढूंढाड़ में एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मैड़ गाँव के बच्चों की टोली समूहबद्ध होकर हाथों में लकड़ी के डण्डे लिये एवं उन्हें बजाते हुए घर-घर जाकर यह गीत गाया करती है:-

गुरु की चोट विद्या की पोट

(गृहस्वामी का नाम) रामलाल जी थारी पोळ

लाख टका सोना को मोल

चतड़ाचोथ बड़भादवो

लड्डू धर दै मेरी माँ ………..

 

मैड़ गाँव के प्रसिद्ध मेले

मैड़ गाँव में प्राचीन काल से ही अनेक मेले लगते रहे हैं जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं-

 

बाणगंगा का मेला

मैड़ गाँव से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बाणगंगा नदी के तट पर पाण्डवों का एक सरकारी मन्दिर (राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग द्वारा संचालित) है जिसे राधाकान्जी या बड़े मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मन्दिर के पाश्र्व में ही एक छतरी है। ऐसा माना जाता है कि इस छतरी के पास ही शमी नाम का वह वृक्ष था जिस पर पाण्डवों ने अज्ञातवाश में जाने से पूर्व अपने हथियार टांगे थे।……… इस मेले में तरह-तरह की दुकानें लगा करती, सर्कस, गीत-भजन आदि के आयोजन होते तथा बच्चे, नौजवान एवं औरतें डोलर हींदे (आकाशीय झूले) में बैठकर आनन्द लिया करते। कोई कोई मनचला शरबत बेचने वाला जवान औरतों को देखकर लकड़ी के हत्थे पर बँधे घँुघरुओं को बजाते हुए जोर-जोर से गाने लगता-

भाया की भाभू ले लै, या तरी करैगो ले लै

या ठण्डो-मीठो ले लै, तू आ जा भाभी ले लै

देखते ही देखते उसकी दुकान पर औरतों का जमघट लग जाया करता  जिसे देखकर एक बारगी तो आने जाने वालों का मन भी ठिठक ही जाया करता।

इस मेले में कोई कोई नवयुवकों का झुण्ड औरतों को देखकर अलीश्ल गीत भी गाने लगता। परन्तु ये गीत भाषा की गूढता, संगीत, लय, आलाप एवं तानों में इस प्रकार निबद्ध होते थे कि सामान्य व्यक्ति को सहज भाव से आनन्दित किया करते परन्तु इनके मर्म को औरतें आसानी से पहचान लिया करतीं और वे तिरछी निगाहों से उन युवकों को देखते हुए विशेष हंसी के साथ बोल पड़ती-

अरै मरो बापकणाओ।

*      गूदडी

बाणगंगा के इस मेले के दूसरे दिन से ही यहां के सभी दुकानदार ग्राम मैड़ के छतरी के बाजार में जाकर अपनी दुकानें लगाया करते………

*      गणगोर्यों का मेला

*      दशहरे का मेला

(उपरोक्त सभी का विस्तृत विवरण पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )

 

सियावर हनुमान जी का मेला

श्री सियावरजी के मन्दिर के महन्त श्री गणेशदास महाराज ने इस मन्दिर के प्रांगण में हनुमान जी महाराज की मूर्ति की स्थापना की एवं अपने आराध्य देव की श्रद्धा में एक मेले का आयोजन कराना प्रारम्भ किया जिसे ‘हनुमान जी का मेलाÓ कहा जाता था। यह मेला बाणगंगा के मेले से छोटा होता जिसमें अन्य कई बातें तो वैसी ही होती परन्तु एक बात नई होती और वह यह कि इस मेले में महन्त महाराज लोक कलाकारों को भी अपनी-अपनी कलाओं के प्रदर्शन का अवसर दिया करते। इन कलाओं में स्वांग, ख्याल, संगीत के दंगल आदि प्रमुख होते। कीरों की ढाणी का कोई कलाकार जब रूपविन्यास कर शीशे में मुँह देख-देखकर बन्दर की नकल करता तो देखने वालों के  पेट में हँसते-हँसते बल पड जाया करते और महन्त महाराज हर ऐसे कलाकार को रूपये ईनाम में दिया करते।

इस मेले में कुश्ती का दंगल हर साल हुआ करता जिसमें दूर-दूर के पहलवान आकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया करते। जो पहलवान कुश्ती में जीतता वह रूपये बँधी बैरंग ले जाया करता और उसके नाम की जय जयकार से आकाश गुंजायमान हो जाया करता। आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व के मेलों में इस कुश्ती का विजेता प्राय: पीपळोद गाँव का गूजरों के सुरज्या पहलवान हुआ करता।

महन्त श्री गणेश दास  महाराज के सभी शिष्यगण इस मेले में अवश्य आया करते तथा इस अवसर पर वे अपने बच्चों का जडूला भी उतरवाया करते। महाराज श्री के लिये यह दिन विशेष होता और इसी दिन वे ऊपरी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों का इलाज़ भी किया करते। इस मेले का आनन्द डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा के निर्देशन में जारी त्रिवेणी कैसेट-सी.डी. के गीत जडूला में लिया जा सकता है जिसका प्रयोग उनके द्वारा लिखित एवं 5 फरवरी 2011 को प्रसारित नाटक मेरी लाडो पढ़ेगी में पाश्र्व से किया गया है।

29 मार्च 1980 को महन्त महाराज स्वर्ग सिधारे जिसके कुछ वर्षो पश्चात् तक यह मेला लगता रहा परन्तु महाराजश्री के उत्तराधिकारियों की अनदेखी से लगभग नब्बे के दशक से यह मेला लगना बन्द हो गया।

*      भजन

महन्त श्री गणेश दास  महाराज की दिनचर्या, सेवा-पूजा एवं उनके द्वारा असाध्य रोग से पीडि़त रोगियों के रोग का निदान करने सम्बन्धी क्रिया कलापों का वर्णन ग्राम मैड़ के विद्वान श्री विश्वनाथ शर्मा  उर्फ श्री सुवा लाल महन्त  ने एक भजन के रूप में लिपिबद्घ किया है। यह भजन ग्राम मैड़ के आस पास के गाँवों में आयोजित सत्संग एवं जागरणों में आज से लगभग पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व तक बड़ी श्रद्घापूर्वक गाया जाता था।

इस पुस्तक के लेखक को बाल्यकाल से ही जागरणों एवं सत्संगों में इस भजन को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । वर्ष 2000 में इस भजन के रचयिता श्री विश्वनाथ शर्मा ने इसके मंचीय प्रस्तुतीकरण एवं प्रकाशन हेतु इस लेखक को अपनी हस्तलिपि में लिखकर भेंट किया था। लेखक ने  उनकी इस अमर कृति को जन-जन तक पहुंचाने के उद्येश्य से उसे इस पुस्तक में सम्मिलित किया है।

 

भजन

 

कहो धन्य गणपति दास नै.. हनुमत नै.. ध्यावै.. छै.. ,

हनुमत नै.. ध्याव.. छै.. वो बजरंग नै ध्यावै.. छै.. ॥ टेर॥

ध्यान देके सुनो जरा, दास का सुनाऊं हाल,

भक्ति में भरपूर कहिए , धर्म को सके ना टाल,

कहां कैसा काम किया, सबको बताऊं हाल।

जयपुर जिला बीच एक, मैड़ नामक ग्राम कहिए ,

मैड़ से पश्चिम की ओर, बाणगंगा धाम कहिए ,

बाणगंगा ऊपर वन में, सियावर स्थान कहिए ,

सियावर के पास मित्रों, हनुमत का दरबार कहिए।

हो गये प्रेम में लीन, बन गये भक्ति के शौकीन,

करी जब उन्नत की तरकीब,

प्रेम से हनुमत ल्यावै छै….।

कहो धन्य गणपति दास नै.. हनुमत नै.. ध्यावै.. छै.. ,

हनुमत नै.. ध्याव.. छै.. वो बजरंग नै ध्यावै.. छै.. ॥ टेर॥

वर्तमान बड़ के नीचे, पहले भी स्थान था,

सादा से पत्थर के रूप, छोटा सा हनुमान था,

छोटी सी गुमटी थी यहां, और ना मकान था,

जा के देखी मूरती, फिट पाँच का अंदाज था,

कीमत पूरी पाँच सौ, और पाँच का विकास था,

इससे ज्यादा गाड़ी भाड़ा, बैल खर्चा और था,

किवाड़ों की जोड़ी, चूना, पट्टïी- भाटा और था।

कर दिया खर्च कुछ और,

जिमाकर विप्रों को उस ठौर,

हो गये राजी नन्द किशोर,

हो गये राजी नन्द किशोर,

रकम शुभ काम लगावै छै..।

कहो धन्य गणपति दास नै.. हनुमत नै.. ध्यावै.. छै.. ,

हनुमत नै.. ध्याव.. छै.. वो बजरंग नै ध्यावै.. छै.. ॥ टेर॥

ध्यान देके सुनो जरा, पूजा का बताऊं नेम,

जायफल का भोग लागे, पूजा होवे तीनूं टेम,

बिना तोल घी का देख्या, करता देख्या हमने होम,

धूप की महकार देखी, और देख्या भारी प्रेम,

छोटे-छोटे बाल बच्चे, रोग में हुए थे जाम,

उनके खाली झाड़ा देवें, औषधि का ले ना नाम,

झाड़ा से ही ब्हाल होवे, ऐसा देख्या हनुमान।

सुनो तुम, नाम गणेश ही दास,

करत है हनुमत की अरदास,

करेंगे हनुमत बेड़ा पार,

करेंगे हनुमत बेड़ा पार,

भजन विश्वनाथ बणावै छै..।

कहो धन्य गणपति दास नै.. हनुमत नै.. ध्यावै.. छै.. ,

हनुमत नै.. ध्याव.. छै.. वो बजरंग नै ध्यावै.. छै.. ॥ टेर॥

 

इस भजन के रचयिता श्री विश्वनाथ शर्मा दीर्घावधि तक महन्त श्री गणेश दास महाराज के निकट सम्पर्क में रहे थे।

इस पुस्तक के लेखक की नाट्यकृति च् तुक्के का बादशाह ज् के नाटक छोटा बेगारी का उन्हीं के निर्देशन में रवीन्द्र मंच, जयपुर पर अनेक बार मंचन किया गया और इसके एक दृश्य में डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा एवं डॉ. योजना शर्मा के निर्देशन में इस भजन को नाटक के पात्रों द्वारा गाया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस नाटक के पात्र  च् पुजारी जी ज्  और कोई नहीं अपितु कमोबेश रूप में महन्त श्री गणेश दास जी महाराज ही हैं।

मैड़ गाँव का पौराणिक, राजनैतिक एवं धार्मिक महत्व अपने आप में अद्वितीय है। यहां की पवित्र बाणगंगा नदी में तो श्रद्धापूर्वक अस्थियां विसर्जित कर मृतात्माओं के मोक्ष की कामना की जाती है।

पढाई जोशी की  जाणो मैड़ की

क     कक्को केवळियो

च      चडा चडा की चंच्या

ट      टीटा टिपोळी

त      तत्तो तमोळी ताँबो

प      पा पा पाटकड़ी

य      यायो सायो पेटळो

श     शस्सो सोळंकी

ह:     हा हा हिंदोली    खिलै फिरावै दो बिंदोली

जोशी की वर्णमाला की नैतिक शिक्षा

वर्णमालाक्षर            बोल                  सीख

क            कक्को केवळियो         पहले कमाना सीखो

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ह:            हा हा हिंदोली           अन्त में जब मरोगे तो हा हा होगी परन्तु पीछे आपके                                         खिलै फिरावै दो बिंदोली   नाम के साथ यश की दो बिंदोली रहेंगी।

जोशी की बारहखड़ी

क     बड कै नांव ‘कÓ

का     कन्ने ‘काÓ

कि     पिच्छ्यूं ‘किÓ

बारहखडी सीखने का गीत

जोशी की पढाई में छोटे-छोटे बच्चों को बारहखड़ी याद करना सिखाने के लिये इस प्रकार से संगीतमय गान कराया जाता था:-        क का कि की कु कू बढाम …………….

 

मैड़-विराट नगर अँचल की रोचक प्रथाएं आदि

*      दोगला मेळा

बामणां कै माथै बीजळो पड़ो म्हारा बाबाजी को मेळो दोगलो कर्यो……………..

*      वर-वधू का तोरण की रस्म से पूर्व मिलन वर्जित

*      चूड़ा एवं नाता प्रथा

पूवा कर्या नै पापड़ी छान कूद बहू आ पड़ी

नुक्ता प्रथा

झाँकड़ी मैं झगड़ो मांच्यो मालपुवां माळै

मरगो मरगो रै पटवारी सौ का लोट कै माळै

पत्तल देना

किसी भी भोज के अवसर पर पत्तल देने की प्रथा प्रचलित है जिसके अन्तर्गत भोज में आये हुए व्यक्तियों को इस भोज के आयोजनकर्ता से उसके सम्बन्ध एवं  प्रचलित प्रथा के अनुसार उस भोज विशेष में बने व्यंजनों युक्त एक पत्तों से बनी पत्तल भरकर या एक निर्धारित माप में व्यंजन, घर ले जाने के लिये दिये जाते हैं………इसी के प्रतीकस्वरूप नाई को ‘सोमांसांतÓ की पत्तल दी जाती है।

सामाजिक अवसरों की कुछ रोचक बातेंं

* झाड़-बोजा उढ़ाबो

* घाटा डाट नुक्ता

मैड़-विराट अंचल में सिंचाई के परम्परागत साधन

लाव-चड़स से सिंचाई

कुआँ जोतने पर

जाग खड़ी व्है खुवाण

पाताळ की राणी सेजा की धराणी………….

बाहर आने परकुए में से पानी भरा चडस

आओ खामी राम का नाम

पैला नाम राम का …………….

कुआँ बन्द करने पर

खुवाण माता ‘सियाबरज्यांÓ  कै जाज्यो

लड्डू पेड़ा खाज्यो

लाडुवां सैं धाप्योडी माता………….

हल जोतने या फसल निकालते समय

श्री रामजी महाराज,

स्यावड माता, धन्ना भगत की ध्याई…….

भाण्ड कला

गाँव वाले       – भाण्ड देवता कैड्या सूं आर्या छो?

भाण्ड          – सीधो  बैकुण्ठ सूं  आर्यो  छूं……….

गाँव वाले       – भाण्ड देवता आपकी उम्र कितनी?

भाण्ड          – अजी म्हांकी उम्र को तो थे ही अंदाजो लगाल्यो। राजा  दुर्योधन नै बहुत समझायो अक मानजा मार्यो जायगो। पाँच- सात गाँव देर पाण्डवां नै राजी कर लै। पण कोनै मान्यो।  जींको फळ पायो।    अर अकबर बादशाह नै म्हे……

 

(उपरोक्त सभी का विस्तृत विवरण पुस्तक  मेरे गीत दिखायें गाँव, डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक- त्रिवेणी कला संगम बी-177 नित्यानन्द नगर, जयपुर राजस्थान में पढें )