VILLAGE PRITHVIPURA

कला

पृथ्वीपुरा की कला जगजाहिर है। यहां सिलावट ब्राह्मण मूर्तियां बनाने का काम करते हैं जिनमें से कई परिवार तो अब जयपुर जाकर बस गये हैं तथा जयपुर के खजाने वालों के रास्ते में उनकी मूर्तिकला की दुकानों सर्वत्र प्रतिष्ठा प्राप्त है। गाँव के लल्लूजी पडित को मूर्तिकला के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

चारों कोनों पर चार देवता

इस गाँव के चारों कोनों पर चार देवता हैं –

* भोम्या जी

प्राचीन काल से ही गाँव के एक कोने पर भोम्याजी विराजते हैं परन्तु गाँव में स्थित भोम्याजी का मंदिर अधिक पुराना नहीं है। गाँव के कुन्दन गुप्ता में भोम्या जी की छाया आती है जहां मंगलवार को बूझा भी निकाली जाती है। कुन्दन जी स्याणा के नाम से जाने जाते हैं और भूत-प्रेत से पीडि़तों का इलाज़ भी करते हैं।

* खेड़ा देवत

* पचवीर

यह देवता बास में स्कूल के पास में विराजते हैं।

* सैय्यद

इसके अतिरिक्त गाँव में सती की गुमटी भी है।

 

झरने

पृथ्वीपुरा की डूंगरी पर देवी के मंदिर के पास में पांच- छह प्राकृतिक झरने हैं जिनका बारिश के दिनों में ऊंचाई से बहता हुआ पानी हर किसी के मन को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इन झरनों को ‘ गोलेंडा के झरने’ भी कहा जाता है।

 

नदी

इस गाँव में होकर प्रवाहित होने वाली नदी को नावली की नदी के नाम से जाना जाता है जो नटनी का बाड़ा से बहती हुई उमरैण के बाँध एवं भरतपुर की सीमा में मिल जाती है।

 

पृथ्वीपुरा : एक परिचय

पृथ्वीपुरा गाँव अलवर जिले का एक प्राचीन गाँव है जो अरावली पर्वत शृंखलाओं की गोद में स्थित है। गाँव में सातों जाति के लोग रहते हैं परन्तु मूर्तिकार, जिन्हें सिलावट भी कहा जाता है के घर यहां पर बहुत हैं।  पास में ही पृथ्वीपुरा का बास है जिसमें मीणा, स्वामी एवं रैबारियों के घर अधिक हैं। इस गाँव की पंचायत के अंतर्गत इमटीपुरा तथा भड़ोली गाँव भी आते हैं। इमटीपुरा में यादव जाति के घर बहुतायत में हैं जबकि भड़ोली में मुसलमान, मेव एवं राजपूतों का बाहुल्य है।  गाँव के पूर्व में मालाखेड़ा, पश्चिम में महाभारतकालीन दर्शनीय स्थल पाण्डवपोल, उत्तर में कला जगत् का अविस्मरणीय प्रतीक नटनी का बाड़ा तथा दक्षिण में बालेटा नामक गाँव स्थित हैं।

इस गाँव के उत्तर-पूर्व में अलवर, उत्तर-पश्चिम में मैड़-बैराठ तथा दक्षिण-पश्चिम में प्रतापगढ़ आदि कस्बे स्थित हैं। पहाड़ी दर्रों के बीच के रास्तों से यहाँ से पाण्डवपोल की दूरी लगभग पन्द्रह किलोमीटर की है। पृथ्वीपुरा में प्राईमरी स्कूल, आयुर्वेदिक तथा ऐलोपैथिक अस्पताल भी हैं।

 

प्रतिभाएं

प्रतिभाएं- श्री सीता राम बडेजा, मुख्य प्रबंधक पंजाब नैशनल बैंक

बाज़ार

पृथ्वीपुरा में प्रमुख रूप से एक ही बाज़ार है जिसे सेठाणा बाज़ार के नाम से जाना जाता है। इस बाज़ार में केवल महाजन जाति की ही दुकानें हैं। राजा जयसिंह जी के ज़माने में यहां का घी का व्यापार प्रसिद्ध था तथा यहां का घी दूर-दूर तक मंगवाया जाता था।

यहाँ के घी के व्यापारी काळू सेठ का नाम उन दिनों बुलंदियों पर था। ऐसी किवदंति है कि काळू सेठ के व्यापार की प्रसिद्धि से ईर्ष्या   रखने वाले कुछ सभासदों ने उनके विरूद्ध राजा जयसिंह जी के खिलाफ कान भर दिये और राजाजी ने उनके आचरण, ख्याति एवं व्यापारिक मानदण्डों को जानने हेतु स्वयं पृथ्वीपुरा जाने का निश्चय किया। जब वे गाँव की सीमा में प्रविष्ट हुए तो बगीचे में गोबर उठा रहे एक देहाती से काळू सेठ के बारे में पूछा। उस व्यक्ति ने सेठ की दुकान की ओर इशारा कर दिया और तुरत फुरत में तैयार होकर अपने असली रूप में काळू सेठ की दुकान पर जा बैठा।

जब सेठ ने विस्मय से गोबर उठा रहे व्यक्ति से उनकी शक्ल सूरत मिलने की बात काळू सेठ को बतायी तो सेठ ने उसे अपना भाई होने का नाटक किया। राजाजी को कुछ शंका हुई और उन्होंने सेठ की प्रतिष्ठा जाँचने हेतु जब सेठ जी से बीस-पच्चीस पीपे घी की व्यवस्था करने की बात कही तो सेठजी का उत्तर सुनकर अवाक रह गये। सेठ जी का उत्तर था-

राजा साहब, आपकी शोभा बीस-पच्चीस पीपों से नहीं बढ़ेगी। आप तो अलवर से पृथ्वीपुरा तक नहर खुदवा दें फिर मैं उसमें घी प्रवाहित कर आपकी शोभा में चार चाँद लगा दूंगा।

राजा जयसिंह जी काळू सेठ की सादगी, प्रतिष्ठा एवं साहस को देखकर प्रसन्न हुए और सेठजी की पीठ ठोककर प्रसन्नता से अपनी राजधानी लौट गये।

 

बाँध

पृथ्वीपुरा में एक प्राचीन बाँध है जिसे ‘ बैड़ा का बाँध’ के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त बालेठा का बाँध भी महत्वपूर्ण स्थल है।

 

बावड़ी

गाँव में एक बणियों की बावड़ी के नाम से जानी जाने वाली एक प्राचीन बावड़ी है जिसमें 151 सीढिय़ां हैं।

 

मन्दिर

इस गाँव में मंदिर बहुतायत में हैं जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं:-

* बाज़ार वाले ठाकुरजी का मंदिर

इस मंदिर के पुजारी जी के कोई पुत्र न था केवल एक पुत्री ही थी तथा वर्तमान में पुजारी जी के दामाद महावीर जी भगवान की सेवा-पूजा किया करते थे।

* लाहोटी वाले ठाकुरजी का मंदिर

यह एक प्राचीन मंदिर है जो आज जर्जर अवस्था में है।  इसके पुजारी श्री राधाकिशन जी मिश्र थे और अब उनके पुत्र जयनारायण एवं पौत्र महेश भगवान की सेवा-पूजा किया करते हैं।

* बास वाले ठाकुरजी का मंदिर

इस मंदिर की सेवा-पूजा वर्तमान में भगवान सहाय जी पुजारी करते हैं।

* कोठी वाले हनुमान जी का मंदिर

* जोर्रा का बड़ वाले हनुमान जी का मंदिर

*  सेढ़ माता का मंदिर

यह मंदिर लुहाटी मोहल्ले में कुए के सामने स्थित है।

 

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वीर महिला : बुद्धो देवी

Buddho

भारत देश की सती सावित्री, सीता अनसूइया आदि का स्मरण करते ही भारतीय नारी का आदर्श स्वरूप मन-मस्तिष्क पर मँडराने लगता है। इसी क्रम में राजस्थान प्रांत के मत्स्यांचल के ग्राम पृथ्वीपुरा में जन्मी बुद्धो देवी का जीवन-चरित हर किसी के लिये प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय है।

आज से लगभग सत्तर-पिचहत्तर वर्ष पूर्व पृथ्वीपुरा गाँव के मुकुंदा अपनी पत्नी सोना के साथ कमाने-खाने जम्मू के लिये निकल पड़े। जब अखण्ड भारत देश के विभाजन का सिलसिला चला तो हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष एवं उपद्रवों ने इस दम्पत्ति को भी जम्मू से भागने हेतु विवश कर दिया यह दम्पत्ति अपनी पाँच दिन की पुत्री बुद्धो को लेकर भागने की जुगत कर रहा था। मुकुन्दा का दिल कमजोर था तथा उस समय हो रहे कत्लेआम का मंजर उसे घर से बाहर निकलने में डरा रहा था, परन्तु साहसी सोना ने अपने पति को एक बड़े संदूक में बंद कर किया और अपनी नन्ही बच्ची को गोद में लिये संदूक के साथ सकुशल अपने ससुराल पृथ्वीपुरा आ पहुंची।

मुकुन्दा एक सीधा सादा एवं संतोषी प्रकृति का व्यक्ति था परन्तु सोना एक साहसी एवं समझदार महिला थी अत: जम्मू से लौटने के उपरांत उसने अपने पति को चार गधे दिलवा दिये और मुकुन्दा गाँव के बनियों एवं बाग-बगीचों का सामान अपने गधों पर ढ़ोकर अपने परिवार के साथ सुख से जीवनयापन करने लगा। गाँव के राजपूतों ने मुकुन्दा-सोना को माफी में पाँच बीघा ज़मीन दी जिसमें कृषि कार्य एवं मज़दूरी करके सोना भी घर-गृहस्थी चलाने में अपने पति की मदद करने लगी।

जब बुद्धो तेरह माह की हुई तभी उसके सिर से पिता का साया उठ गया। बुद्धो  के कोई भाई नहीं था। उसकी दो बड़ी बहिनें  विवाह के पश्चात्  अपने-अपने ससुराल चली गई। ग्यारह वर्ष की आयु में बुद्धो का विवाह अडौली गाँव के श्री घम्मन लाल के साथ हुआ परन्तु 18 वर्ष की आयु में गौना होने के पश्चात् भी वे अपने ससुराल में न रहकर अपने पति के साथ स्थायी रूप से पृथ्वीपुरा में ही रहने लगी और बुद्धो बुआ के नाम से पूरे गाँव की चहेती बन गई। परन्तु बुद्धो  को दाम्पत्य सुख से तभी वंचित होना पड़ा जब उनके पति  उसके पेट में डेढ़ माह का बच्चा छोड़कर स्वर्ग सिधार गये।

बुद्धो  पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। वह युवा विधवा समाज के छद्मवेशी चरित्र की कुदृष्टि से अपने आपको सुरक्षित रखने में कभी-कभी असहाय सी महसूस करने लगी। उसके एक जीजा ने भी साल भर तक उसका इसलिए पीछा किया कि वह उसकी चूड़ी पहन ले, परन्तु बहादुर माँ की इस साहसी पुत्री ने अपने स्त्रीत्व की रक्षा के लिए डटकर सभी का मुकाबला किया और अपने नन्हे बच्चे सीताराम को गोद में लिए मेहनत मजदूरी केू सहारे हर कठिन परिस्थिति का मुकाबला करते हुए जीवन में आगे बढऩे लगी।

बुद्धो देवी के संघर्ष के सोपान

* युवा विधवा बुद्धो  ने अपनी माँ की मृत्यु के उपरान्त नौ सौ रू. किलो के भाव में अपनी साढे चार किलो चाँदी बेची, कहीं से कर्ज लिया और कुल ग्यारह हजार रू. खर्च करके पूरी बिरादरी को निमंत्रण देकर अपनी माँ का विधि विधान से नुक्ता करके पुत्री के रूप में पुत्रधर्म का पालन किया।

* नन्हे सीताराम को पेट पर बाँधे कई वर्षों तक मजदूरी की, घास एवं जँगल से लकडिय़ों के गट्ठर लाकर साहस के साथ जीवनयापन करती रही।

* ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा रखने वाली बुद्धो  देवी अपने नन्हे बच्चे को कमर से बाँधकर भर्तृहरी महाराज के कनक दण्डवत देती रही।

* बुद्धो देवी का जीवन में एक ही सपना था , अपने बेटे सीताराम को जीवन में कामयाब बनाना एवं उसका चरित्र निर्माण करना, जिसमें वे पूण्रूपेण सफल हुइ। सीताराम भारतीय संस्कृति, नीति, आदर्श आदि को ठोस रूप में ग्रहण करके अपने जीवन में स्थापित हुए। उन्होंने एम.कॉम., सीएआईआईबी, एम.बी.ए. आदि की पढ़ाई की और वर्तमान में पंजाब नैशनल बैंक में मुख्य प्रबन्धक के रूप में कार्यरत हैं।

उनकी माँ बुद्धो की सीताराम को दी गई यह चेतावनी कितनी महान् है – ‘ जिस दिन तुमने कोई $गलत काम किया या एक भी पैसा रिश्वत का लिया उस दिन मैं तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिये छोड़कर कहीं चली जाऊंगी’

कितनी महान है कर्म, सत्यता, नीति एवं शिक्षा की यह देवी , इसे हमारा शत् शत् नमन्।

 

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Editor : Dr. Kailash Chandra Sharma